कुम्भलगढ़ का दुर्ग (राजसमन्द), कुंभलगढ़ दुर्ग की विशेषताएं (kumbhalgadh ka durg (rajsamand), kumbhalgadh durg ki visheshatay)

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कुम्भलगढ़ का दुर्ग (राजसमन्द) (kumbhalgadh ka durg (rajsamand)

कुम्भलगढ़ का दुर्ग
कुम्भलगढ़ का दुर्ग

मेवाड़ के इतिहास ग्रंथ कविराजा श्यामलदास दघवाड़िया विरचित ‘ वीर विनोद ‘ के अनुसार महाराणा कुम्भा ने वि . संवत् 1505 ( 1448 ई . ) में कुम्भलगढ़ का दुर्ग या कुम्भलमेरू दुर्ग की नींव रखी । उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार इस दुर्ग के निर्माण के लिए जिस स्थान को चुना गया , वहाँ पर मोरी ( परमार ) शासक सम्प्रति द्वारा निर्मित एक प्राचीन दुर्ग भग्नावस्था में पूर्व में ही विद्यमान था । महाराणा कुम्भा ने इस प्राचीन दुर्ग के ध्वंसावशेषों पर नये दुर्ग की नींव रखी । इस किले का निर्माण लगभग दस वर्षों में 1515 ( 1458 ई . तक ) सम्पन्न हुआ ।

इस दुर्ग का निर्माण कम्भा के प्रमुख शिल्पी और वास्तुशास्त्री मंडन की योजना और देखरेख में किया गया ।

वीर विनोद में उल्लेख मिलता है कि विक्रम संवत् 1442 ई . में मांडू ( मालवा ) के सुल्तान महमूद खिलजी ने महाराणा कुम्भा के हाथों अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए कुम्भलगढ़ पर जोरदार आक्रमण किया तथा किले के बाहर केलवाड़ा गाँव में गढ़ी के भीतर विद्यमान बाणमाता के प्राचीन मन्दिर को अपना लक्ष्य बनाया । गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने 1457 ई . में एक विशाल सेना के साथ मेवाड़ पर प्रयाण किया तथा कुम्भलगढ़ दुर्ग को घेर लिया । भीषण युद्ध के बावजूद वह दुर्ग लेने में असफल रहा तथा वापस लौट गया । यह नियति की कैसी कर विडम्बना है कि मेवाड़ के यशस्वी शासक महाराणा कुम्भा की उन्हीं के द्वारा निर्मित कुम्भलगढ़ दुर्ग में उनके ज्येष्ठ राजकुमार ऊदा द्वारा धोखे से पीछे से वार कर हत्या कर गई ।

उक्त प्रसंग का यह दोहा प्रसिद्ध है

ऊदा बाप न मारजे , लिखियो लाथै राज । देस बसायो रायमल , सर्यो न एको काज ।

1.मेवाड़ के राणा कुम्भा, अलाउद्दीन खिलजी (mevaad ke raana kumbha, alauddeen khilajee)


1.चित्तौड़ के शासक विक्रमादित्य, राणा सांगा, बहादुरशाह (chittaud ke shaasak vikramaadity, rana sanga, bahaadur shaah)

कुंभलगढ़ दुर्ग की विशेषताएं (kumbhalgadh durg ki visheshatay)

महाराणा रायमल के कुँवर पृथ्वीराज और संग्रामसिंह ( राणा सांगा ) का बचपन इसी कुम्भलगढ़ दुर्ग में ही व्यतीत हुआ ।

इनमें कुँवर पृथ्वीराज अपनी तेज धावक शक्ति के कारण इतिहास में ‘ उड़णा पृथ्वीराज ‘ के नाम से प्रसिद्ध है ।

राणा साँगा की मृत्यु के अनन्तर मेवाड़ राजपरिवार की आन्तरिक कलह के घटनाक्रम में स्वामिभक्त पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन की बलि देकर उदयसिंह को बनवीर ( पासवान पुत्र ) के कोप से बचाया व कुम्भलगढ़ में उसका लालन – पालन किया । आगे चलकर इसी दुर्ग में उदयसिंह का मेवाड़ के महाराणा के रूप में राज्याभिषेक हुआ । 1537 ई . में यहीं से प्रयाण करके उदयसिंह ने बनवीर को परास्त कर चित्तौड़ पर वापस अपना अधिकार स्थापित किया था ।

1.चित्तौड़ का वीर पत्ता, चित्तौड़ की स्थापत्य, चित्तौड़ के पोल (chittod ka veer patta, chittoor ki stapana, cittoor ke pol)


2.चित्तौड़गढ़ दुर्ग की विशेषताएं, सूर्य मन्दिर (chittorgard durg ki visheshtaye, surya mandir)


3.राजस्थान के दुर्ग, भूमि दुर्ग की विशेषताएं, वीर अमरसिंह राठौड़ (rajasthan ke durg, bhumi durg ki visheshatay, veer amarsingh rathor)


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